परिसंचरण तंत्र Circulatory System
परिसंचरण तंत्र Circulatory System
शरीर में हृदय के नियमित संकुचन से रक्त नलिकाओं के माध्यम से पूरे शरीर में रक्त के प्रवाह होने को रक्त परिसंचरण कहते हैं जिसके द्वारा शरीर की समस्त कोशिकाओं तक ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है तथा आंतरिक श्वसन के फलस्वरुप उत्पन्न हुई कार्बन डाइऑक्साइड का शरीर से निष्कासन होता है।
इन समस्त प्रक्रियाओं का अध्ययन परिसंचरण तंत्र के अंतर्गत किया जाता है
परिसंचरण तंत्र के अंग
- हृदय
- धमनी
- शिराएं
- फेफड़े
हृदय Heart हृदय परिसंचरण तंत्र का सबसे प्रमुख अंग है, जो कि विशेष प्रकार के ऊतकों से निर्मित होता है जो नियमित व लयबद्ध रूप से सिकुड़ता और फैलता है।
प्रत्येक व्यक्ति का ह्रदय सामान्य रूप से उस व्यक्ति की मुट्ठी के बराबर होता है। एक सामान्य वयस्क का के दिल का वजन लगभग 250 से 350 सौ ग्राम तक हो सकता है।
हृदय वक्ष गुहा के मध्य से थोड़ा सा बाई तरफ स्थित होता है
हृदय में 4 कोष्ठ चेम्बर होते हैं, दो ऊपर और दो नीचे।
ऊपर के 2 कोष्ठ (चेंबर) दाएं और बाएं आलिन्द (Atrium) कहलाते हैं
नीचे के 2 कोष्ठ (चेंबर) दाएं और बाएं निलय (Ventricle) कहलाते हैं
दाएं आलिंद और दाएं निलय के बीच त्रि-वलयी कपाट (ट्राई कस्पिड वाल्व Tricuspid Valves) होते हैं
बाएं आलिंद और बाएं निलय के बीच द्वि-वलयी कपाट (बाइ कस्पिड वाल्व Bicuspid Valves) होते हैं
यह दोनों प्रकार के कपाट (Valves) रक्त को केवल आलिंद से निलय की बहने देते हैं।
धमनी Artery: हृदय से शरीर के विभिन्न भागों को रक्त ले जाने वाली रक्त वाहिकाओं को धमनी कहा जाता है। धमनियों में शुद्ध रक्त (ऑक्सीजन युक्त रक्त) बहता है। धमनिया शरीर में गहराई में स्थित होती हैं तथा ह्रदय द्वारा पंप किए गए रक्त की दबाव इनके भीतर रक्त का प्रवाह तेज होता है अतः रक्त के दबाव को को सहने के लिए इनकी है परत अपेक्षाकृत मोटी और मजबूत होती हैं। धमनियों में वाल्व नहीं होते हैं
शिराएं Veins: शरीर के विभिन्न अंगों से रक्त को हृदय तक लाने वाली रक्त नलिकाओं को शिराएं कहते हैं। शिराओं में अशुद्ध रक्त (ऑक्सीजन रहित) रक्त बहता है। शिराएं त्वचा की ऊपरी सतह के नजदीक होती हैं तथा इनके भीतर रक्त का प्रवाह धीमा होने के कारण रक्त का दाब भी कम होता है। शिराओं में रक्त के प्रवाह को सुचारू रखने के लिए वाल्व (Valves) होते हैं जो कि शिराओं में रक्त को पीछे की ओर नहीं बहने देते हैं.
धमनियों की अपेक्षा शिराओं की नलिकाओं की परतें पतली और कमजोर होती हैं।
फेफड़े Lungs लंग्स
थोरेसिक कैविटी में दो फेफड़े दाएं और बाएं स्थित होते हैं । फेफड़ों में प्रवेश करने वाली ब्रोंकस (Bronchus) आगे चलकर छोटी छोटी बहुत सारी शाखाओं में बंट जाते हैं
फेफड़े Lungs लंग्स
थोरेसिक कैविटी में दो फेफड़े दाएं और बाएं स्थित होते हैं । फेफड़ों में प्रवेश करने वाली Bronchus ब्रोंकस आगे चलकर छोटी छोटी बहुत सारी शाखाओं में बट जाते हैं जिन्हें Bronchi ब्रोंकाई कहा जाता है जो अंत में गुच्छे नुमा आकृतियां बनाती हैं जिन्हें एलविओली (Alveolies) कहा जाता है जहां पर रक्त में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान होता है।
कार्य करने की हिसाब से फेफड़े रबर के गुब्बारे की तरह इलास्टिक थैले होते हैं जिससे यह सांस लेने और छोड़ने पर फैल और सिकुड़ सकते हैं,
दाहिना फेफड़ा बाएं फेफड़े की अपेक्षा थोड़ा सा बड़ा होता है, क्योंकि बाएं फेफड़े में 2 लोब्स व दाहिने में 3 लोब्स होते हैं तथा बाया फेफड़ा हृदय को समायोजित करने के लिए थोड़ा सा स्थान बनाता है जिस कारण वह थोड़ा सा छोटा होता है
दोनों फेफड़े थोरेसिक कैविटी में एक चौड़े अवतल मांसल आधार पर टिके होते हैं जिसे Diaphragm डायाफ्राम कहते हैं।
प्रत्येक फेफड़ा एक पतली झिल्ली से घिरा होता है जिसे Pleurae प्लूरी कहते हैं फेफड़े की बाहरी दीवार और फेफड़े के बीच में एक द्रव भरा होता है जो फेफड़े को घर्षण व बाहरी दबाव से बचाते हैं हैं जिन्हें Bronchi ब्रोंकाई कहा जाता है जो अंत में गुच्छे नुमा आकृतियां बनाती हैं जिन्हें Alveolies एलविओली कहा जाता है जहां पर रक्त में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान होता है।
कार्य करने की हिसाब से फेफड़े रबर के गुब्बारे की तरह इलास्टिक थैले होते हैं जिससे यह सांस लेने और छोड़ने पर फैल और सिकुड़ सकते हैं,
दाहिना फेफड़ा बाएं फेफड़े की अपेक्षा थोड़ा सा बड़ा होता है, क्योंकि बाएं फेफड़े में 2 लोब्स व दाहिने में 3 लोब्स होते हैं तथा बाया फेफड़ा हृदय को समायोजित करने के लिए थोड़ा सा स्थान बनाता है जिस कारण वह थोड़ा सा छोटा होता है
दोनों फेफड़े थोरेसिक कैविटी में एक चौड़े अवतल मांसल आधार पर टिके होते हैं जिसे Diaphragm डायाफ्राम कहते हैं।
प्रत्येक फेफड़ा एक पतली झिल्ली से घिरा होता है जिसे Pleurae प्लूरी कहते हैं फेफड़े की बाहरी दीवार और फेफड़े के बीच में एक द्रव भरा होता है जो फेफड़े को घर्षण व बाहरी दबाव से बचाते हैं
परिसंचरण तंत्र से संबंधित प्रमुख कारक
- हार्ट रेट
- स्ट्रोक वॉल्यूम
- कार्डियक आउटपुट
- वाइटल कैपेसिटी
हृदय गति (हार्ट रेट Heart Rate)- HR
सामान्य तौर पर एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति का हृदय एक मिनट में 72 बार धड़कता है जिसे हार्ट रेट कहते हैं।
स्ट्रोक वॉल्यूम (Stroke Solume)- SV
हृदय द्वारा एक धड़कन में (एक बार संकुचित होने में) शरीर में पंप की जाने वाली रक्त की मात्रा स्ट्रोक वॉल्यूम कहलाती है। सामान्य तौर पर यह 70ml होती है।
अर्थात एक बार धड़कने ने हृदय हमारे शरीर में 70ml रक्त पंप करता है।
कार्डियक आउटपुट (Cardiac Output)- CO
हृदय द्वारा एक मिनट के समय में शरीर में पंप किए जाने वाले रक्त की मात्रा को कार्डियक आउटपुट कहते हैं। सामान्य रूप से यह मात्रा लगभग 5 लीटर होती है।
1 मिनट में हृदय की 72 धड़कन × 70ml = 5040 ml.(अर्थात लगभग 5 लीटर रक्त)
कार्डियक आउटपुट = हार्ट रेट x स्ट्रोक वॉल्यूम
CO = HR x SV
शरीर में रक्त का परिसंचरण
हृदय से शरीर के विभिन्न अंगों में रक्त ले जाने वाली नलिकाओं को धमनी (आर्टरी Artery) कहते हैं।
तथा शरीर के विभिन्न अंगों से हृदय की ओर रक्त लाने वाली नलिकाओं को शिरा (वेन Vein) कहा जाता है
शरीर में रक्त का परिसंचरण निम्नलिखित 6 चरणों में होता है
1- संपूर्ण शरीर से अशुद्ध रक्त (ऑक्सीजन रहित रक्त) ऊपरी एवं निचली महा शिराओं द्वारा हृदय के दाहिने आलिन्द (एट्रियम atrium) में प्रवेश करता है। जिसकी मात्रा लगभग 70ml होती है।
2- दाहिने आलिन्द से 70ml अशुद्ध रक्त त्रि-वलयी कपाट (ट्राई कस्पिड वाल्व Tricuspid Valves) को पार कर दाहिने निलय में प्रवेश करता है
3- हृदय के दाहिने निलय के संकुचित होने पर वही 70ml अशुद्ध रक्त फुफ्फुस धमनी (पल्मोनरी आर्टरी pulmonary artery) के द्वारा फेफड़ों में पहुंच जाता है।
फेफड़ों में अशुद्ध रक्त में सांस द्वारा ली गई ऑक्सीजन घुल कर रक्त शुद्ध (ऑक्सीजन युक्त) हो जाता है तथा अशुद्ध रक्त की कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) सांस के माध्यम से शरीर से बाहर आ जाती है
4- फेफड़ों से वही 70ml शुद्ध रक्त (ऑक्सीजन युक्त रक्त) फुफ्फुस शिराओं (पल्मोनरी वेन pulmonary vein) के माध्यम से हृदय के बायें आलिन्द में पहुंचता है
5- बायें आलिन्द से वही 70ml शुद्ध रक्त द्वि-वलयी कपाट (बाई कस्पिड वाल्व, Bicuspid Valves) को पार कर बायें निलय में प्रवेश करता है।
6- हृदय के संकुचित होने पर बायें निलय से वही 70ml शुद्ध रक्त महाधमनी (aorta) तथा अन्य छोटी धमनियों के माध्यम से शरीर के समस्त अंगों की कोशिकाओं तक पहुंचता है। जहां पर शुद्ध रक्त से ऑक्सीजन कोशिकाओं द्वारा अवशोषित कर ली जाती है तथा कोशिकाओं में निर्मित कार्बन डाइऑक्साइड रक्त में घुल जाती है।
फिर विभिन्न शिराओं के माध्यम से अशुद्ध रक्त कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रक्त वापस हृदय के दाहिने आनंद में पहुंचता है तथा वही प्रक्रिया पुनः शुरू हो जाती है। यह प्रक्रिया जीवन पर्यंत चलती रहती है
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